समाज सुधार में रिऐक्टिव और प्रोऐक्टिव का अंतर

रिऐक्टिव व्यक्ति जो सामने है वो देखता है। और उसे बाधाएँ दिखती हैं। प्रोऐक्टिव व्यक्ति वो देखता है जो वो बनाना चाहता है, और उसे संभावनाएँ दिखती हैं। मान लो व्यक्ति देश का विकास चाहता है। रिऐक्टिव व्यक्ति बोलेगा – ये सारे अधिकारी भ्रष्ट हैं, सड़कें खराब हैं, कचरा जमा है, इन सब को ठीक करना है। यह कल्पना करना कठिन नहीं कि वह बहुत जल्द ओवरवेल्म महसूस करेगा।

प्रोऐक्टिव व्यक्ति कहेगा मैं क्या रचना चाहता हूँ? मैं एक साफ देश का निर्माण करना चाहता हूँ। अभी सड़कों पर कचरा है। मैं कैसे नागरिकों की मदद कर सकता हूँ इसे साफ़ रखने में। एक तो मैं अनेक कूड़ेदान लगा सकता हूँ जगह-जगह, यह पहली मुहिम। दूसरा मैं हर मोहल्ले में कुछ लोगों को मुखिया बना सकता हूँ जो सफाई का जिम्मा अपने सर लें, और उसे नीच काम समझने के बजाय, खुद कचरे का डिब्बा खाली करें, अपने साथियों के साथ सड़कों पर झाड़ू करें। तो उसमें कुछ शिक्षा भी लगेगी। अगर कोई सेलेब्रिटी हमें इस काम के लिए जॉइन कर सकें तो मार्केटिंग भी हो जाएगी, और लोगों का खूब मन लगेगा। देखते ही देखते संभावना से संभावना उपज रही है, ऐक्शन से ऐक्शन फूट रहा है। यह होता है दुनिया को प्रोऐक्टिवली देखने का असर।

रियैक्टिव व्यक्ति प्रतिक्रिया के चक्र में धँसता जाता है। मुझे इस अधिकारी से ये काम करवाना है। पर वह घूस मांगेगा। अगर तंत्र को सुधारना है तो मुझे उसे नौकरी से निकलवाना होगा। अब मुझे उसके लिए सबूत चाहिए। तो हो सकता है उससे पंगा ले कर रिकॉर्डिन्ग बनानी पड़े। लेकिन हो सकता है उसका वरिष्ठ अधिकारी भी भ्रष्ट हो। अब क्या? ये लोग नेता के साथ मिल कर मुझ पर पुलिस चढ़ा सकते हैं। यदि मुकदमा हुआ तो मेरे पैसे का खर्चा शुरू हो जाएगा, अगर पुलिस ने एक रात भी थाने में अटकाया तो बहुत लाठियाँ मारेगी।

जहाँ प्रोऐक्टिव व्यक्ति सकारात्मक ऐक्शन्स के चक्र से सशक्त होता जाता है। वहीं रिऐक्टिव व्यक्ति एक से बढ़ कर एक डरावनी प्रतिक्रिया के कुचक्र में फँसता जाता है। हमें इस वन-रूपी देश में कुछ नवनिर्माण करना है तो हम रास्ते में हर मधुमक्खी का छत्ता नहीं तोड़ते चल सकते। रिऐक्टिव होना डर और बेबसी पैदा करेगा, प्रोऐक्टिव होना सीधा और सरल मार्ग दिखाएगा।


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