विद्वान और मूर्ख में अंतर

मैं विचारों का आदमी हूँ। मेरा सबसे बड़ा आनंद है विपरीत मत वाले विद्वान से चर्चा करना, मेरा सबसे बड़ा दर्द है एक मूर्ख से बहस में पड़ना, और मेरा सबसे बड़ा डर है दोनों में अंतर न बता पाना।

इसलिए मैंने ऐसी ही एक बहस के बाद सोचा, विद्वान के लक्षण क्या हैं? मेरा उत्तर ये निकला –

१. वह कहता है मुझे नहीं पता

२. वह कहता है आपको क्या लगता है? जिज्ञासु है

३. वह अपने ज्ञान को अपने निजी अनुभव से सीमित देख पाता है, और ऐसा कहता है। किसी सार्वभौमिक सत्य से ज्यादा ‘मेरे अनुभव में’ का इस्तेमाल ज्यादा करता है

४. वह अपना पक्ष रखने से पहले आपके मत का जो भाग सच्चा लगा, उसे पुष्ट करता है

इन बिंदुओं से गुजरते समय मूर्ख की परिभाषा भी साफ़ हो गई –

१. वह मानता है कि उसे पूरी बात पता है

२. वह आपके मत या अनुभव के बारे में नहीं पूछता, नहीं जानना चाहता

३. उसे लगता है उसका निजी अनुभव ही पूरा सच है

४. वह आपके मत को अवैध समझता है। दुनिया काली या सफेद है

मूर्खों से बहस में पड़ना, नागफनी (कैक्टस) के झुंड पर गिरने सा होता है। ऐसी बहस के बाद मैं चैन से सो नहीं पाता। मुझे तब केवल एक चीज़ चैन देती है – अपने डर को मानना, कि उस बहस से मेरे अंदर के पूर्वाग्रह वैसे ही बली हो गए होंगे जैसे उस मूर्ख के थे। और अब मैं उसके जैसा बन गया हूँ। ये डर एक सतर्क व्यक्ति के सबसे बड़े डरों में है, कि वह अंधा हो गया है। एक बार इसे स्वीकार लेने के बाद इसकी पकड़ मुझ पर ढीली होती है। फिर मैं अगले कदम पर बढ़ता हूँ, उस मूर्ख के विचारों में जितना भाग सच था, उन्हें उनकी वैधता देना। यह करने से मन में खुलापन बनता है, और वह जो डर था (कि मैं भी पूर्वाग्रही बन गया हूँ), उसे एक ठोस उदाहरण मिल जाता है विपरीत पक्ष की स्वीकृति का। इस अनुभव में मालूम पड़ता है कि उन्हीं विपरीत विचारों का डर काटों की तरह मन पर गढ़ गया होता है। यह स्वीकृति उन काँटों को निकाल देती है, और मन वापस स्वस्थ होने लगता है


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